प्यार का पंरीदा
प्यार में तड़फते देखा.
उसे प्यार में मरते देखा,
और देखा प्यार के लिए जीने की तम्मना.
मैंने देखा उसके प्यार को,
वह निष्ठुर बना रहा.
न समझ पाया परिंदे के प्यार को,
और बन बैठा हत्यारा अपने प्यार का.
क्या गुनाह किया परिंदे ने,
सिर्फ किया तो उसने प्यार था.
जी रहा वो हत्यारा पँछी का,
आज किसी दूसरे यार संग.
नवगीत: रंगों का नव पर्व बसंती ---संजीव सलिल
रंगों का नव पर्व बसंती
रंगों का नव पर्व बसंती
सतरंगा आया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया
आशा पंछी को खोजे से
ठौर नहीं मिलती.
महानगर में शिव-पूजन को
बौर नहीं मिलती.
चकित अपर्णा देख, अपर्णा
है भू की काया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया
कागा-कोयल का अंतर अब
जाने कैसे कौन?
चित्र किताबों में देखें,
बोली अनुमानें मौन.
भजन भुला कर डिस्को-गाना
मंदिर में गाया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया
है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया
--संजीव सलिल
दोहे चुनाव सुधार के : --संजीव 'सलिल'
दोहे चुनाव सुधार के :
संजीव 'सलिल'
बिन प्रचार के हों अगर, नूतन आम चुनाव.
भ्रष्टाचार मिटे 'सलिल', तनिक न हो दुर्भाव.
दल का दलदल ख़त्म हो, कोई न करे प्रचार.
सब प्रतिनिधि मिलकर गढ़ें, राष्ट्रीय सरकार.
मतदाता चाहे जिसे, लिखकर उसका नाम.
मतपेटी में डाल दे, प्रतिनिधि हो निष्काम..
भाषा भूषा प्रान्त औ' मजहब की तकरार.
बाँट रही है देश को, जनता है बेज़ार..
समय सम्पदा श्रम बचे, प्रतिनिधि होंगे श्रेष्ठ.
लोग उसी को चुनेंगे, जो सद्गुण में ज्येष्ठ..
संसद में सरकार संग, रहें समर्थक पक्ष.
कहीं विरोधी हो नहीं, दें सब शासन दक्ष..
सुलझा लें असद्भाव से, जब भी हों मतभेद.
'सलिल' सभी कोशिश करें, हो न सके मनभेद..
सब जन प्रतिनिधि हों एक तो, जग पाए सन्देश.
भारत से डरकर रहो, तभी कुशल हो शेष..
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हिन्दी ब्लागिंग नि:स्वार्थ होनी चाहिए :रानी विशाल न्यूयार्क


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"मेरा सोभाग्य तो वही होगा की आप सब मुझे मेरे ब्लॉग के नाम से नहीं बल्कि मेरी कविताओ से पहचाने" किंतुसंवाद की शुरुआत तो किसी नाम से ही हो पाती है । इसीलिए काव्य तरंग अपने नए स्वरुप में आप सबके समक्षप्रस्तुत है ........कविता की नई नई तरंगे लेकर !!
सादर
रानीविशाल
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माटी की गागरिया..के गीतकार स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी का स्मरण........
माटी की गागरिया.........
के गीतकार स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी का स्मरण दिला कर कमाल किया बवाल ने
इस रिकार्डिंग की ख़बर बवाल को भी नहीं है
नवगीत: जीवन की जय बोल... --संजीव 'सलिल'
नव गीत
संजीव 'सलिल'
जीवन की
जय बोल,
धरा का दर्द
तनिक सुन...
तपता सूरज
आँख दिखाता,
जगत जल रहा.
पीर सौ गुनी
अधिक हुई है,
नेह गल रहा.
हिम्मत
तनिक न हार-
नए सपने
फिर से बुन...
निशा उषा
संध्या को छलता
सुख का चंदा.
हँसता है पर
काम किसी के
आये न बन्दा...
सब अपने
में लीन,
तुझे प्यारी
अपनी धुन...
महाकाल के
हाथ जिंदगी
यंत्र हुई है.
स्वार्थ-कामना ही
साँसों का
मन्त्र मुई है.
तंत्र लोक पर,
रहे न हावी
कर कुछ
सुन-गुन...
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एक मित्र को पत्र
प्राथमिक शाला में एक मित्र को पत्र लिखना था लिखा किन्तु बेहद त्रुटी पूर्ण होने से मुझे दंड मिला पत्र आज पूरा कर रहा हूँ शायद आप को पसंद आये
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उड़न तश्तरी से रू ब रू : ब्लागिंग पर समीर लाल
मशहूर ब्लॉगर श्री समीर लाल जी से हुई बात चीत में ब्लागिंग को लेकर हुई चर्चा का पहला एपीसोड सादर प्रस्तुत है.समीर लाल जी का मत है कि हिंदी ब्लागिंग अपने उच्च मुकाम पर पहुंचेगी ये तयशुदा बात है .
समीर लाल जी से हुई बात चीत सुनिए नीचे और संवाद एवं विमर्श पर भी
गत्यात्मक ज्योतिष की प्रवर्तक श्रीमती संगीता पुरी जी की भविष्यवाणी सही साबित हुई
उत्पाद महंगे , उत्पादक भिखमंगे
दरअसल हुआ ये कि ;उस दिन अचानक श्रीमती जी की जगह जोश में मैं ख़ुद राशन लाने चला गया, वहाँ जाकर मेरे अंदाजे का क्या रहा, या कि मुझे आंटे दाल का भाव कैसे पता चला, और ये कि मुझे ये नहीं समझ आया कि अब तक सब्जी , फलों वालों ने अपने यहाँ क्रेडिट कार्ड मशीन क्यों नहीं लगाई, इन सब बातों को तो रहने ही दिजीये, मैंने तो ये सोचा कि यार जब आंटे , चावल, दालों, सब्जी आदि का भाव इतना आसमान छू रहा है तो अपने किसान काका गाओं में बैठ कर चांदी कूट रहे होंगे , तभी कहूं कि इतने दिनों से मुझसे बात भी नहीं की। मैंने तय किया कि आज ही फोन मिलाता हूँ।
फोन मिलते ही मैंने तो बस हालचाल ही पूछा कि वो बगैर पूछे ही शुरू हो गए, " बेटा मैं तो पिछले कई दिनों से तुमसे बात करने की सोच रहा था , मगर झिझक के कारण कुछ कह नहीं पा रहा था , दरअसल तुम्हारी काकी, तुम्हारे भैया, भाभी सभी बीमार पड़े हैं और घर में इतने पैसे भी नहीं हैं कि इलाज करा सकूं। यहाँ सबका यही हाल है । वो जो कोने के मकान वाले दिनू चाचा थे उन्होंने तो परसों ही फांसी लगा ली बेटा साहूकार के कर्जे के कारण। तू जल्दी से कुछ पैसे भेज सके तो अच्छा हो।"
आज की रचना: संजीव 'सलिल'
आज की रचना: दोहा सलिला
संजीव 'सलिल'
सत्ता की जय बोलिए, दुनिया का दस्तूर.
सत्ता पा मदमस्त हो, रहें नशे में चूर..
है विनाश की दिशा यह, भूल रहे सब जान.
वंशज हम धृतराष्ट्र के, सके न सच पहचान.
जो निज मन को जीत ले, उसे नमन कर मौन.
निज मन से यह पूछिए, छिपा आपमें कौन?.
एक नहीं दो-दो मात्राएँ, नर से ज्यादा भारी.
आज नहीं चिर काल से, रहती आयी नारी..
मैन आप वूमैन वह, किसमें ज्यादा भार?
सत्य जान करिए नमन, करिए पायें प्यार.
मुझे तुम न भूलीं, मुझे ज्ञात है यह.
तभी तो उषामय, मधुर प्रात है यह..
ये बासंती मौसम, हवा में खुनक सी-
परिंदों की चह-चहसा ज़ज्बात है यह..
काल ग्रन्थ की पांडुलिपि, लिखता जाने कौन?
जब-जब पूछा प्रश्न यह, उत्तर पाया मौन..
जय प्रकाश की बोलिए, मानस होगा शांत.
'सलिल' मिटाकर तिमिर को, पथ पायें निर्भ्रांत..
परिंदा नन्हा है छोटे पर मगर है हौसला.
बना ले तूफ़ान में भी, जोड़ तिनका घोंसला..
अश्वारोही रश्मि की, प्रभा निहारो मीत.
जीत तिमिर उजियार दे, जग मनभावन रीत..
हम 'मैं' बनकर जी रहे, 'तुम' से होकर दूर.
काश कभी 'हम एक' हों, खुसी मिले भरपूर..
अनिल अनल भू नभ सलिल, मिल भरते हैं रंग.
समझ न पाता साम्य तो, होता मानव तंग.
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श्री शरद कोकास, श्री कुलवंत हैप्पी, श्रीमती संगीता पुरी श्री अविनाश वाचस्पति एवंभाई दीपक मशाल से बात चीत
एक कोशिश है पाडकास्ट साक्षात्कार
सादर

यहाँ तीर्थ तुल्य माता होती
मेरे प्रिय गीतकार गुरु घनश्याम चौरसिया बादल की रचना जो दिल की गहराइयों में आज तक सम्हाली हुई है आप सभी के लिए सादर प्रस्तुत है











