नवगीत: रंगों का नव पर्व बसंती ---संजीव सलिल

रंगों का नव पर्व बसंती

रंगों का नव पर्व बसंती
सतरंगा आया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

आशा पंछी को खोजे से
ठौर नहीं मिलती.
महानगर में शिव-पूजन को
बौर नहीं मिलती.
चकित अपर्णा देख, अपर्णा
है भू की काया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

कागा-कोयल का अंतर अब
जाने कैसे कौन?
चित्र किताबों में देखें,
बोली अनुमानें मौन.
भजन भुला कर डिस्को-गाना
मंदिर में गाया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

--संजीव सलिल

4 टिप्पणियाँ:

RaniVishal २५ फरवरी २०१० १२:१२ AM  

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
Waah! bahut satik ..! behtreen rachanake liye Aacharyaji ko bahut aabhar!

Udan Tashtari २५ फरवरी २०१० ३:२५ AM  

बहुत मस्त होली गीत..मजा आया आचार्य जी.

'अदा' २५ फरवरी २०१० ४:५५ AM  

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

haii dekho to hug kar rahe hain log aur aap pareshaan hai..are abhi tak to ii bhi mil raha baad mein yeho nahi milega...samjhe na..

bahut khoob...

दिव्य नर्मदा divya narmada १ मार्च २०१० ३:५२ PM  

गीत सराहा, धन्यवाद लें, सफल हुआ लेखन.
मिलें अदा से अदा गले तो धरती हो मधुवन..
हग में नहीं मज़ा वैसा, जैसा है गले मिलने में.
हग में है गैरियत, गले मिलने में अपनापन..

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